आँख क्यों चुराती हो,
आँख क्यों चुराती हो ।
आँख क्यों चुराती हो ,
हर बार मिलने पर,
वो अधूरी-सी मुस्कान,
सब कुछ कह जाती है।
क्या छिपा रही हो इन पलक़ों की ओट में,
इसे दिल ने कब का पहचान चुका है?
यूँ नज़रें फेर लेती हो,
जैसे मेरा होना कोई ख्वाब हो
या डर हो किसी टूटते वादे का।
पर जानता हूँ मै,
जब मैं सामने होता हूँ,
तब तुम्हारी धड़कनें भी थोड़ा तेज़ चलती हैं।
क्यों नहीं थमती एक पल के लिए,
ये सवालों की रफ़्तार?
तुम क्यों नहीं कह देती हो,
जो आंखें हर रोज़ बयाँ कर जाती हैं?
ये नज़रों का खेल भी अजीब है,
एक पल में कशिश, दूसरे पल में दूरी है।
आँख क्यों चुराती हो,
जब तुम जानती हो,
मेरे हर सवालों का जवाब
तुम्हारी खामोश निगाहों में ही छुपा होता है।
तभी तो लगा जैसे पलकों के पीछे
कोई तूफ़ान बसा है,
जो बरसना चाहता है
सिर्फ़ मेरे होने पर।
तुम्हारी चुप्पी भी मुझे पुकारती है,
जैसे तुम कह रही हो —
“रुक जाओ, मत देखो इतना गहराई से,
मैं कहीं खो न जाऊँ इन आँखों में।”
पर ये दिल तो वही चाहता है,
जो तुम्हारी आँखें छिपाना चाहती हैं।
तुम जितना दूर जाती हो,
मैं उतना ही करीब महसूस करता हूँ तुम्हें।
आँख क्यों चुराती हो,
क्या डर है इस चाहत से?
क्या दुनिया की परवाह,
हमारे जज़्बातों से बड़ी हो गई है?
अगर डर है भी, तो चलो उसे भी बाँट लो,
मैं वही रहूँगा,
जो तुम्हारी चुप्पी को भी समझेगा,
तुम्हारी नज़रों की भाषा में ।
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इस बार मत चुराओ नज़रें,
बस एक पल के
लिए
रुको, देखो, कहो कुछ नहीं —
मैं सब समझ जाऊँगा।
संयोग कुमार ठाकुर
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