"तुम्हें कश्ती लिखूं या किनारा लिखूं" हिंदी कविता
"तुम्हें कश्ती लिखूं या किनारा लिखूं"
तुम्हें कश्ती लिखूं या किनारा लिखूं,
है उलझन ये दिल की, तुम्हें क्या धारा लिखूं।
तुम्हारी आँखें है सागर सी, अनंत और गहरे,
या बस एक लहर है, जो देखा था सांझ सबेरे?
तुम ही बताओ मैं क्या लिखूं?
तुम्हें कश्ती लिखूं या किनारा लिखूं,
तेरी आंखों में डूबा हूँ ,
क्या मैं खुद को ही दोबारा लिखूं?
तुम लहरों की नमी हो या तट की तसल्ली,
तुम सन्नाटा हो या किसी गीत की हल्की सी वो धुन।
कभी तुम लगती हो मुझे रौशनी से भरे,
कभी छाँव की तरह, ख़ामोशी से परे।
तुम्हें मौसम कहूं जो हर वक्त बदलता रहे,
या वो पल कहूं जो सदा के लिए याद रहे?
तुम्हारी हँसी में है मीठी सी बात कोई,
जो हर दर्द को भी बना दे जज़्बात कोई।
कभी हो अधूरी सी कोई दास्तान,
कभी हो मुकम्मल, किसी गीत का गान।
जो हर बार सुना, हर बार लुटा।
तुम्हें आँधी कहूं या बहारों की फूल,
तुम हो समझदारी या कोई भूल?
तुम्हारी चुप्पी में था एक शोर सा,
जो दिल की दीवारों से जा टकरा गया ।
तुम्हें आवाज़ कहूं या ख़ामोशी का रंग,
क्या तुम हो अधूरा या पूर्ण किसी संग?
क्या तुम कश्ती हो, जो मुझे दूर ले चली ,
या किनारा हो, जहाँ रुक जाएं हर कश्ति।
तुम्हें मंज़िल कहूं या सफर का सुरूर,
तुम ही बताओ, तुम क्या हो?
तुम जवाब हो या फिर कोई और दस्तूर?
तुम्हें चाहा भी, पर कभी कह न सका,
तुमसे बिछड़ कर भी मैं रह न सका।
तुम्हें कविता कहूं या अधूरी कहानी,
तुम कोई वजह हो या कोई रवानी?
अब सोचता हूं, इस दिल के इशारे,
तुम्हें लिखूं कैसे — भंवर या किनारे?
कश्ती भी तुम, और तट भी तुम्हीं हो,
सवाल भी तुम और जवाब भी तुम्हीं हो।
तो लिखता हूं तुमको उसी रूप में,
जैसे छू ले कोई ख्वाब, धूप मे।
कभी लगता है तुम सफर की हो थकान,
कभी लगता है तुम हो सुकून की जान।
कभी तूफ़ान बनकर चले आते हो,
कभी चुपचाप मेरी साँसों में समा जाते हो।
तुम्हें रास्ता कहूं, या कोई भूल भुलैया,
या अधूरी सी वो कविता,
तुम हो तो दिल का हर एक कोना आबाद है,
तुम नहीं तो सब कुछ, बस एक सूना सा ख्वाब है।
तुम्हारी बातों में है नर्म हल्की सी बारिश,
पर छूकर भी छोड़ गई एक खाली सी प्यास।
तुम मुस्कुराओ तो खिले गुलाब,
पर काँटों से भरे थे कुछ पुराने वो जवाब।
कभी लगे तुम जैसे मेरी मंज़िल हो,
कभी लगे तुम तो बस एक मुश्किल हो।
तुम्हें समझा भी बहुत, पर समझ पाया नहीं,
तुम्हें पाया भी कई बार, पर ठहर पाया नहीं।
कभी लगता है तुम नाम हो किसी दुआ का,
कभी लगता है तुम सवाल हो किसी सजा का।
तुम्हारी चुप्पी भी कुछ कहती रही,
और मेरी बेचैनी हर रोज़ बढ़ती और
सब कुछ सहती रही।
तो अब तय नहीं कर पाता है दिल मेरा,
कि तुम हो क्या — मेरा घर या सफर का डेरा।
इसलिए अब सोचता हूं, क्यों कोई नाम दूं,
तुम्हें खुदा कहकर अपनी रूह में थाम लूं।
संयोग कुमार ठाकुर
“कभी लगा है आप अपनी ख़ामोशी से भी बातें कर लेते हैं —
बताईए, आपकी कौन सी चुप्पी ने आपको जीना सिखाया है
कॉमेंट कीजिए ......
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