"जैसे खुले आसमान में अकेली चांद नज़र आती हो।" हिंदी कविता
जैसे खुले आसमान में अकेली चांद नज़र आती हो।
अंदर से कुछ और, बाहर से कुछ और नज़र आती हो,
जैसे कांटों से घिरी गुलाब नज़र आती हो।
मुस्कानों की सिलवटों में छुपी है कोई उदासी,
आँखों की चमक में भी एक वीरानी सी दिखाई देती है।
जैसे खुले आसमान में अकेली चांद नज़र आती हो।
हर रोज जब देखता हूँ तुम्हें,
एक नई कहानी, एक नया रंग ले आती हो।
बोलती हो तो जैसे चाँदनी बिखर जाती है,
मगर शब्दों के पीछे कोई आँधी हो।
जैसे यादों की बरसात करा जाती हो।
चेहरे पर सजी है मुस्कान की रेखा,
मगर दिल के कोने में कोई टूटी हुई लेखा।
सज-धज कर चलती हो जैसे रात की रानी,
मगर भीतर की आवाज़ कुछ और ही कहती हो कहानी।
हर हँसी तुम्हारी जैसे कोई अदा हो पुराना,
हर नज़र जैसे खुद से ही हो अनजाना।
तुम्हारी खामोशियों में शोर हो समंदर का,
मुस्कान ऐसे, जैसे बंजर रेत पर ,
चमकता रौशनी ढलते सूरज का।
तुम वो आइना हो जिसमें सच नहीं दिखता,
तुम वो कहानी हो जो अधूरी रही।
अंदर जल रहा है दीपक बुझते अरमानों का,
बाहर छाया है तेज़ प्रकाश स्वाभिमानों का।
तुमसे मिलकर लगता है
हर इंसान के दो पहलू होते हैं,
एक जो ज़िन्दगी में चलती है,
और एक जो भीतर कहीं रोते हैं।
मुझे मत कहो कि मैं तुम्हें जानता हूँ,
क्या तुम्हारे भीतर की स्त्रियों से मैं अनजान हूँ।
जो खुद में ढूंढ रही हैं खुद की पहचान,
और बाहर ओढ़े हुए है समाज की शान।
तुम्हारा सच तुम्हारी आँखों के पीछे है,
तुम्हारी कहानी तुम्हारी चुप्पियों ने सींचे है।
कभी अपने ही भीतर उतर कर देखो,
जो दिखती है दुनिया को, क्या वही तुम हो?
अंदर से कुछ और, बाहर से कुछ और नज़र आती हो,
जैसे कांटों से घिरी गुलाब नज़र आती हो।
मुस्कानों की सिलवटों में छुपी है कोई उदासी,
आँखों की चमक में भी एक वीरानी सी दिखाई देती है।
जैसे खुले आसमान में अकेली चांद नज़र आती हो।
संयोग कुमार ठाकुर
ये कविता उसी कहानी की झलक है।
जिसने आपको भी कुछ पल के लिए सोचने पर मजबूर किया होगा...
तो कमेंट में "सच है" लिखें,
और शेयर करें — ताकि कोई और भी उसे पढ़कर खुद को थोड़ा कम अकेला महसूस करे।
धन्यवाद
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