शीर्षक: "मेरे ख्वाबों के शहर में भटक रहा है कोई। "हिंदी कविता


शीर्षक: मेरे ख्वाबों के शहर में भटक रहा है कोई।

चल पड़ा हूँ मैं, न जाने किस गली, किस डगर,

ना नक्शा है, ना मंज़िल है, बस एक बिखरा सफर।

हवाओं के झोंको में सुने हैं कुछ गीत पुराने ,

आसमान की आँखों से बहता है जैसे समंदर कोई।

लगता है मेरे ख्वाबों के शहर में भटक रहा है कोई।


हर मोड़ पर बिखरी हैं कुछ अधूरी कहानियाँ,

किसी की हँसी, किसी की चुप सी निशानियाँ।

इन गलियों में सदियाँ भी थमी हैं शायद,

हर कदम पर दिखती हैं खोई सी वो बीते लम्हें।

लगता है मेरे ख्वाबों के शहर में भटक रहा है कोई।


इक टूटता हुआ तारा मेरा साथी है यहाँ,

इक बंजारापन मेरा जीवन है यहाँ।

रौशनी भी जैसे नींद में बहकी हुई लगती है,

ख्वाबों की मिट्टी से बने हैं रास्ते जहाँ।

लगता है मेरे ख्वाबों के शहर में भटक रहा है कोई।

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कभी कोई साज़ बजता है दूर कहीं,

कोई साया पुकारता है चुपके से वहीं।

मैं थमता नहीं, न मैं रुकता हूं कहीं,

जैसे रूह का सफर हो, दिल की जमीं।

कैसे बताऊं, कैसे जीता हूँ मैं यहां,

लगता है मेरे ख्वाबों के शहर में भटक रहा है कोई।


इन हवाओं में गूंजती है कोई तन्हा सी दुआ,

हर शाख पे अटका कोई भूला हुआ सपना।

इन दीवारों से झाँकते हैं चेहरे बेनाम,

कहते हैं, "रुक जा, जी ले हमें भी जरा।"

लगता है मेरे ख्वाबों के शहर में भटक रहा है कोई।


मैं भटकता हूँ, मगर खोता नहीं,

हर धुंधली सी उम्मीद में खुद को पाता भी नहीं।

शायद ये रास्ते भी मुझसे पूछते हैं,

"कहाँ जाना है तुझे, किस ओर जाना है अभी?"

लगता है मेरे ख्वाबों के शहर में भटक रहा है कोई।


मुझे तो बस चलना है, चलते जाना है,

हर ख्वाब के पेड़ से यादें चुनते जाना है।

शायद किसी मोड़ पर, किसी उजाले के पार,

मिल जाए वो शहर... जहाँ रूह को मिल जाए करार।

थक गया हु अभी, अभी बहुत दूर जाना है


चल पड़ा हूँ मैं, न जाने किस गली, किस डगर,

ना नक्शा है, ना मंज़िल है, बस एक बिखरा सफर।

हवाओं में उलझे हैं कुछ पुराने गीत,

आसमान की आँखों से बहता है जैसे समंदर कोई।

लगता है मेरे ख्वाबों के शहर में भटक रहा है कोई।

                                       संयोग कुमार ठाकुर 

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