"मन का मंदिर: एक ऐसी कविता जो प्रेम, क्रोध और उम्मीद को एक साथ थामे है"
"मन का मंदिर"
इस मन रूपी मंदिर में,
ताले नहीं हैं, पर खुले भी नहीं,
भीतर कुछ छुपा-छुपा सा है,
कुछ उजला है, कुछ धुले नहीं।
हां, हैं यहाँ लालच के दीप जले,
तृष्णा की बातियाँ धधक रही,
क्रोध की राख़ें हवा में उड़ रही,
और हवस भी कहीं चुपचाप सुलग रही।
पर उसी कोने में, इक दीप जला है,
तुम्हारे नाम से ही तो, प्रेम में बहा है,
नर्म लौ सी जलती भावना,
जिसमें सिर्फ़ तुम्हारा ही चेहरा दिखता है।
सम्मान की घंटियाँ भी बजती रहीं है,
तेरे लिए हर दिन आरती सी चढ़ती रही है,
पर तुम्हारी आँखों ने देखा क्या?
सिर्फ़ धुआं, सिर्फ़ छाया, सिर्फ़ भय।
दोष क्या मेरा है, या तेरे नज़रों का?
जो देख सका न वो प्रेम और सम्मान,
जो गिन न सका वो काँटे,
जो तूने कभी चुभाए थे,
तेरे नाम से जो उड़ा था धूल।
अब मुरझाए से हैं वो फूल।
तू ठहरा मापक दुनिया का,
तौलता रहा भावों के पलड़े से,
तुझे दिखा जब भी अंधेरा,
तू रोशनी की ओर कभी चला ही नहीं।
मन के भीतर इस उजाले को कभी देख,
इस भीड़ में उस एक प्रेम को परेख,
जो न शोर करता है, न दावा करता है,
बस तेरी ख़ुशी में ही जीता-मरता है।
मत देख सिर्फ़ उस दीवारों की दरार को,
कभी देख उस दीवार पे लटकती तस्वीर
तेरे नाम से लिखा गया वो इकरार भी है,
जो तूने कभी पढ़ा ही नहीं...
तो अब आ,
पल भर को ध्यान से देख —
इस मन के मंदिर में
तू ही तो ईश्वर है,
और तेरी हर भावना ही पूजा।
"तो क्या इन सबसे परे
कुछ कोमल भाव नहीं हो सकते?"
शेर भी तो भूखा सो जाता है,
पर हिरन को छूता तक नहीं,
क्या यह प्रेम नहीं है?
एक ऐसा प्रेम —
जो अधिकार नहीं जताता,
जो छूता तक नहीं, बस देखता है,
और चुपचाप लौट जाता है।
मन का मंदिर भी वैसा ही है —
कभी आक्रोश से भर जाता है,
कभी मौन में डूब जाता है,
मगर भीतर कहीं एक कोना
तुम्हारे लिए आरक्षित है,
जहाँ बस तुम्हारा ही नाम लिखा होता है।
इस मंदिर में अगर कुछ विकार हैं,
तो कुछ संस्कार भी तो पलते हैं ।
हर दोष के नीचे कोई पुकार भी है,
जो हर वक्त तेरे नाम से गूंजते हैं।
संयोग कुमार ठाकुर
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