(हाँ, मैं रावण हूँ । ) "रावण की आत्मा से उठते सवाल: क्या हम सिर्फ उजाले की कहानी पढ़ते हैं?" हिंदी कविता
😇 हाँ, मैं रावण हूँ ।
हाँ, मैं रावण हूँ, अभिमानी सही,
पर क्या केवल अभिमान ही मेरी कहानी रही?
दस सिरों में छिपे वो दस विचार थे,
हर चेहरा किसी अनुभव के उपहार थे।
कैलाश उठाया था, ब्रह्मा से भी वर पाया था ।
पर कभी धर्म से आंखें नही चुराया ,
विद्या में दक्ष, शिवभक्त मैं महान था,
काल भी था मेरे वश में,
आसमान को तप की ज्वाला से जलाया था।
हां सीता का अपहरण किया मैंने,
पर सीता को छूआ तक नहीं, ये मेरा प्रण था ।
मैं राजनीति का मोहरा बना, किंतु उसका मुझे खल नहीं,
पर मर्यादा का पालन भी सत्य था।
वो धर्मयुद्ध था कोई छल नहीं,
ये सत्य है, राम पूज्य हैं, पर क्या मैं पापी हूँ?
इतिहास ने मुझे शत्रु घोषित किया,
या युगों से गढ़ा गया क्या मैं भ्रमित हूँ?
मेरे लंका में सोना ही नहीं,
कहीं न्याय, नीति, और ज्ञान भी था ।
मैंने स्त्रियों की मर्यादा रखी,
पर क्या मेरे गुनाहों की गिनती ही सब कुछ था ?
मेरे वध को धर्म की जय बताई गई,
पर क्या मेरी दृष्टि से कभी कथा सुनाई गई?
जो सत्य असुविधाजनक लगे, वो असत्य नहीं होता,
हर राक्षस का अंत नहीं, उसका पक्ष भी था होता ।
मैंने युद्ध किया, अपने स्वाभिमान के लिए,
भाई विभीषण को भी ठुकराया सम्मान के लिए।
मुझे अभिमानी कहा, कहा दंभ का प्रतीक,
पर क्या स्वाभिमान को बचाना भी है कोई अपराधिक?
तो हाँ, मैं रावण हूँ ।
वो जो झुकता नहीं,
जो हर शोषण के आगे रुकता नहीं।
मैं हर उस शख्स में ज़िंदा हूँ
जो सिस्टम के खिलाफ अकेला खड़ा है।
जो भीड़ से अलग सोचता है,
जिसे समाज ‘दुष्ट’ कहकर भगा देता है।
जिसके अंदर है बदलाव की अग्नि ,
जो पूजा नहीं जाता, पर ज़रूरत है सवाल की।
राम ने मुझे मारा ये धर्म की विजय थी,
पर मेरी हार में भी एक विचार की पराजय थी।
मैं बुरा था, पर क्या सब कुछ बुरा था मेरा?
या फिर इतिहास ने सिर्फ उजाला को ही लिखा सवेरा?
मुझमें अधर्म था स्वीकार है मुझे,
पर मुझमें ज्ञान, विज्ञान, और विचार भी थे कुछ विशेष।
अगर मैं सिर्फ बुरा होता,
तो राम भी मेरे अंतिम संस्कार में आंसू न बहाते।
किन्तु , अब हर गली में हैवान खड़ा है,
औरतें लूटी जा रही हैं सरेआम,
अब बच्चे भी महफूज नही,
इंसानी रूप में शैतान खड़ा है ।
वो मेरी विवशता थी,
अगर न लेता उसका प्रतिशोध,
तो मेरी आत्मा करती मेरा विरोध।
जनता भी सदियों तक धिक्कारती,
मुझे कायर कह पुकारती।
आज जो रावण खड़ा है,
क्या ये मेरे करतूतों से फल बड़ा है।
नही, इसमें मेरा कोई दोष नही,
ना ये कोई मेरा साया है,
मेरी दशा तो केवल राम ही जानते थे,
तभी तो मेरे मरते वक्त वो भी आंसू बहाए थे।
तो हाँ, मैं रावण हूँ ,
पर मैं केवल एक पात्र ही नहीं,
मैं एक दर्पण भी हूँ —
जिसमें तुम सबका सच छिपा है कहीं।http://superindiastory.blogspot.com/2025/05/blog-post_15.html
संयोग कुमार ठाकुर
✍️ आपके विचार क्या हैं? क्या इतिहास हमेशा सही होता है?
रावण सिर्फ बुरा था, या कुछ misunderstood भी था?
कमेंट में जरूर बताएं और इस कविता को शेयर करें, अगर आपको भी लगता है कि हर कहानी के दो पक्ष होते हैं।
अगर कोई भूल हुई है तो क्षमा करें।
मेरा इरादा किसी के दिल को ठेस पहुंचाना नही है।
क्योंकि आज कल राई को पहाड़ बना देते हैं। उल्टे सीधे अर्थ निकाल लेते हैं।
धन्यवाद ................
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