"समर्पण " संयोग कुमार ठाकुर द्वारा रचित हिंदी प्रस्तुति
हमने अपनी राहें मोड़ी है, तुम्हे पाने की चाह में,
छोड़ दिया स्वार्थों का ताजमहल, चल पड़ा सच्ची राह में।
तू मिले या न मिले मुझको, पर इतनी सी बात है,
तुझमें ही मेरा कल था,
तुझमें ही में मेरा आज है।
तेरे लिए ही लिखा है जीवन का सारा अध्याय ,
तेरे आने की खुशी में हर एक पल को है सजाए।
ना दौलत की चाह, ना नाम का शोहरत,
बस तेरा एक झलक , मेरे आंखों को ठंडक मिल जाए ।
तेरे दुःख को अपना समझा, तेरे सुख से मुस्काया,
तू जो रोयी रातों में, मेरा मन भी भर आया।
तेरी छाया बनके, तेरे साथ चलूं ,
तू मुझसे दूर रहे , ये मै कैसे सहूं ।
तू मेरा राग है, तू ही ताल, तू ही मेरा गीत है,
तेरे बिना लगे अधूरा हर सांस, ऐसी प्रीत है।
तू जब बोले, लगे सारा जग गा रहा है,
तू जो चुप हो, मन भीतर शोर मचा रहा है।
तेरी नजरों में दिखती है मेरी आराधना,
तुझमें छिपी है मेरी आत्मा की भावना।
ना मैं पुजारी हूं, ना तू देवता, फिर भी तू पूज्य है,
तेरे स्पर्श में ही मेरी समर्पण की सच्ची गुंज है।
मैंने तेज दिए अपने सपने, तेरी आशाओं में,
खुद को खो दिया तेरे जीवन की परछाइयों में।
माँगा नहीं कुछ भी तुमसे, ना ही कोई मोल रखा,
तेरे सिवा हर चाह को मन ने अपने से तोल रखा।
चल पड़ा हूं उस डगर पर, जहाँ तू भी साथ नहीं,
तुझसे जुड़ी हर बात है, तुझसे ही बात नहीं।
मैंने माना तुझको अपने अंदर का ईश्वर,
तू दूर सही, पर सबसे अधिक तुम हो प्रियवर।
तेरे ही नाम से जुड़ी है मेरी हर एक सांस,
तेरे ही नाम से होता है दिन का पहला प्रकाश।
तू सवेरा भी, तू ही रात है, तू ही जीवन की बात है,
तू ना हो तो लगे अधूरी ये सृष्टि, अधूरी ये कायनात है।
समर्पण वो दीपक है जो जलता है मौन रहकर,
हर अंधेरे को हर लेता, स्वयं को राख कर।
ना कोई घमंड, ना इच्छा कोई, बस है स्नेह और प्यार,
समर्पण वो भाव है जो करता जीवन को है स्वीकार।
माँ जैसी ममता में बहता, बाप जैसी दृढ़ता में,
प्रेमिका सी कोमलता लेकर, प्रेम की सच्चाई में।
समर्पण हर रिश्ते में है, बस पहचानना आता नहीं,
जो जान ले इसे गहराई से, उसे फिर कोई खोता नहीं।
तेरी आंखों में देखा , तेरी खामोशी पढ़ी मैंने,
तेरे बिना हर मोड़ पर ,तेरी आहट सुनी मैंने।
तू ना दिखा तो क्या हुआ, वो एहसास तो साथ था,
दिल की धड़कन ने तेरा नाम जपा,
बस तेरी यादों में दिल उदास था ।
तू छू के भी छूता नहीं, तू पास होकर भी दूर है,
पर समर्पण वो भाषा है,
जो समझे उसके लिए वो कोहिनूर है।
ना शब्दों की दरकार उसे, ना तर्कों की जरूरत है,
वो तो बहता है दिल से दिल तक,
बनकर एक खूबसूरत दरिया की मूरत है।
ना कोई हार है इसमें, ना ही कोई जीत है,
दिल तो बस प्रेम की धरती है, जिसमें पनपते प्रीत हैं।
तू जो चाहे वह कर, मेरा कोई अधिकार नहीं,
मैंने खुद को सौंप दिया है, अब तुझसे इंकार नहीं।
तू माने या ना माने, पर मैंने खुद को खोया है,
तेरे प्रीत की आग में तपकर, मैंने बहुत ही रोया है।
अब जो भी हूँ, वो तेरा हूँ, ना कोई और दिशा,
ना कोई आशा,
समर्पण ने रच दी है मेरी नई परिभाषा।
संयोग कुमार ठाकुर
💬👻 > समर्पण वो रिश्ता है जो नाम, पहचान या साथ नहीं माँगता... बस एक एहसास बनकर हर सांस में बहता है।
जब प्रेम सिर्फ पाने की चाह नहीं, बल्कि पूरे अस्तित्व को अर्पित करने का नाम बन जाए, तब जन्म लेता है "समर्पण"।
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