इंसानी जज़्बातों की किताब – "मैं खुद ही एक किताब हूँ ।"
मै इतना भी सरल नही,
एक ही दिन में पढ़ लोगे क्या?
वर्षो की लिखावट हूँ मैं,
हर पन्ने पे जली है मेरी रातें,
हर शब्द में बगावत हूँ मैं।
हर शब्द में है धैर्य छुपा,
हर वाक्य में मेरा संघर्ष है।
मुस्कानों की स्याही से लिखा है मैंने,
दर्द का मैं वो सच्चा चिट्ठा हूं मै।
चेहरे पर जो दिखती लकीरें,
वो वक्त के कलम की निशान है,
मैं खुद को संवारते-संवारते,
बन गया हूं पत्थर ,
मुझे तोड़ना इतना आसान नहीं है।
समझ सको तो पढ़ो गहराई से,
यूँ ही मत करना पार नजर,
मैं किताब नहीं, ज़िंदगी हूँ,
हर पन्ना है इक नया सफर।
तुमने मुझे बस एक नजर में देखा,
और सोचा शायद आसान हूँ मैं,
पर क्या तुमने कभी पढ़ा है मुझे,
किस तरह से परेशान हूँ मैं?
मैं वो नहीं जो सिर्फ दिखता हूँ,
मैं वो हूँ जो वक्त ने गढ़ा है मुझे।
हर मोड़ पर जो टूटा हूँ,
फिर खुद को फिर से जोड़ा है,
ये इतना भी आसान नही है।
तुम्हें लगता होगा मैं शांत हूँ,
पर भीतर शोले जलते हैं।
हर मुस्कान के पीछे छिपे,
सैकड़ों आंसू पलते हैं।
धैर्य की स्याही से लिखा हूँ,
संघर्ष की कलम से रचा है मैंने।,
हर दिन जो जीया है ,
उनसे कुछ नया सिखा है मैंने।
जब रातें नींद चुराती थीं,
तब मेरा ख्वाब जलता था ।
हर ठोकर, हर दर्द सहकर,
मै फिर से खुद सपने बुनता था।
इतना आसान नही था चलना राहों में,
ना कोई साया साथ चलता था।
जो भी था — बस अकेला मैं था ,
और अंदर एक हौसला था।
खुद को शब्दों में बाँधा,
खुद से कहानियाँ कही ।
टूट कर भी मुस्कुराया,
क्योंकि हारना मेरी फितरत नहीं।
अब जो तुम मुझे देख रहे हो,
तो सिर्फ तस्वीर ही मत देखना ।
ये चेहरा कई रातों की मेहनत का है,
हर रेखा कहानी है कहता।
ये आँखें सिर्फ देखती नहीं,
कई सपनों की गवाह हैं ।
और खामोशीयों में दबी
हज़ारों चीखें दफन पड़ी हैं।
क्या तुम पढ़ पाओगे मुझे?
क्या समझ सकोगे इस राज़ को?
मैं कोई किताब नहीं,
मैं एक ज़िंदा एहसास हूँ।
ना मेरी कहानी आसान है,
ना मैं कोई जादुगर हूँ,
मैं वही हूँ जो हर दिन खुद को,
एक जलती आग में तपाता हूँ।
तो जब भी देखो मुझे,
तो उस नजर से मत देखना,
क्योंकि मैं एक किताब नहीं —
पूरा एक जीवन का अनुभव हूँ...
संयोग कुमार ठाकुर
💢💔कई बार लोग आपको पढ़ते नहीं, बस आपकी "खुश" तस्वीर देख लेते हैं।
पर अंदर जली रातों, टूटी हड्डियों, और फिर खड़ी हुई हिम्मत की कोई खबर नहीं होती।
यह कविता उन सभी के लिए है जिन्होंने "मुस्कुराकर" दर्द छुपाया और हर दिन खुद को फिर से बनाया।
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