"अपनी ही कहानियां ढूंढ रहा हूं।" कभी-कभी खुद को खोकर ही खुद को पाया जाता है...


📖अपनी ही कहानियां ढूंढ रहा हूं।

इस किताब के पन्ने में
अपनी ही कहानियां ढूंढ रहा हूं,
जो कभी वक़्त की भीड़ में कहीं खो गई थीं।

एक वक़्त था जब मैं
हर सपने को शब्द बनाता था ।
हर जज़्बात के पन्नों पर
उसे सजाकर रखता था।

फिर ज़िंदगी तेज़ हुई, रफ्तार 
और मैं कहीं पीछे रह गया ।
किताबों की जगह हथौड़े ने ले ली ,
और कलम की जगह हाथो ने चौक थाम ली ।

अब जब वक्त ने थोड़ी राहत दी,
रुका हूं एक पल को ।
वो अधूरी बातें,
फिर से आवाज़ें देने लगीं।

फिर जब मैंने पुराने पन्ने पलटे,
तो कुछ धूल में लिपटे अल्फाज़ निकले।
कुछ सपनों की झलक मिली,
जो कभी मेरे थे, पर अब अनजान निकले।

हर पन्ना जैसे कोई आईना बन गया हो,
मुझे ही मुझसे मिलवाने लगा हो।
जो मैंने ही कहीं खो दी थी,
वो लफ़्ज़ अब एक पहचान बन गया हो ।
मैं ढूंढ रहा हूं उस एक हल्की सी मुस्कान को,
जो बेफिक्री में खिला करती थी ।
उस डर को भी,
जो कभी मुझसे लड़ने को तैयार रहा  करती थी।

मैं खोज रहा हूं वो मासूम सवाल को 
जो मैंने कभी खुद से पूछा था।
और वो जवाब,
जो दिल में कहीं छिपा बैठा था।

अब समझ आया है मुझे,
कि खुद को पाना आसान नहीं होता ।
ये किताब ही मेरा जीवन है,
जिसके हर पन्ने में मैं ही  छुपा हूं कहीं।

अब हर रोज़ एक पन्ना पलटता हूं,
खुद से दोबारा मिलता हूं ।
कुछ टुकड़े जोड़ता हूं,
कुछ सच भी स्वीकारता हूं।

हो सकता है पूरी कहानी
कभी फिर से ना मिल सके ।
पर जो खो गया था हमने 
उसे ढूंढने का सफर ही मेरी असल कहानी है।

                     Sanyog Kumar Thakur 
🔁 अगर आपने भी कभी खुद को पन्नों में ढूंढा है,
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