✍️ "मेरी कलम "– जब ज़ुबानें चुप हो जाएँ, तब कलम बोलती है। हिंदी कविता
🖊 मेरी कलम 🖋
बोलती है कलम बेजुबानो से भी,
मेरी कलम, मेरी जुबां है ।
जब काग़ज़ पर दौड़ती ये है,
दर्द-ए-दिल भी मुस्कुरा देता है।
मेरी कलम, मेरी जान है।
इसमें है माँ की ममता भरी,
पिता का साया, छाँव सुनहरी।
मेरी कलम में बसते हैं ख्वाब सारे,
जिनमें रंग हैं सपनों के प्यारे-प्यारे।
मेरी कलम से लिखे हर अल्फाज
कभी हँसी के, कभी गम के,
तो कभी प्रेम की धुन में चलती।
कभी इंकलाब की मशाल बन कर जलती,
कभी दुआ बन के बहती शबनम सी बहती।
जब समाज में दम घोटती आवाज़ें,
सहम जातीं हैं डर की साज़िश से l
तब वो कलम ही रणबांकुरी बन कर,
लड़ती है अन्याय की बंदिश से।
ये कलम ही तो है जो लिखती है,
अधूरी प्रेम कहानी को।
जिसे कोई सुन न पाए ,
वो दर्द भी सुनाती है दुनिया को।
जब अंधेरों में उजाले ढूँढते हैं लोग,
तब कलम बनती है एक दीपक।
कभी उम्मीदों की लौ बन जाती है।
कभी चेतना की चिंगारी सुलगाती है।
मेरी कलम में, मेरे गाँव की मिट्टी है,
जिससे बचपन के वो गीत सजे हैं।
बनिया, दर्जी, मज़दूर ,किसान, ,
सबके सपने इसमें गुँथे हैं।
ये कलम कोई बंदूक नहीं,
मगर तोप से भी कम नही।
सच को लिख दे ऐसे लफ्ज़ों में,
सत्ता की भी नींद उड़ जाए पल भर में।
ये कलम सिर्फ़ स्याही नहीं बहाती,
ये खूनी जज़्बात से रंग है सजाती।
कभी क्रांति के स्वर लिख देती,
कभी अमन का गीत है सुनाती।
ये कलम एक आइना है,
जो दिखाती है समाज को सच।
ना डरती है, ना झुकती है,
बोलती है हक़ और नीयत के पक्ष।
इसी से मैं जिंदा हूँ शायद,
वरना भीड़ में कहीं खो जाता।
ना कोई पहचान होती मेरी,
ना कोई सपना संजो पाता।
जब तक साँसे चलती हैं,
चलती रहेगी मेरी कलम।
अब वो लिखेगी हर उस आवाज़ को,
जो दबा दी जाती है ज़ुल्म से हर दम।
अंत में मैं बस इतना ही कहूँगा ,
अगर है कोई सच्चा हमदम,
तो वो है मेरी कलम ।
मेरी कलम, मेरी कलम...
संयोग कुमार ठाकुर
✨ भूमिका :
कभी-कभी शब्दों में इतनी ताक़त होती है कि वे किसी की ज़िंदगी बदल सकते हैं। जब दिल की बात ज़ुबां नहीं कह पाती, तब एक सच्चे लेखक की कलम वह सब कुछ कह देती है जो बात अंदर कहीं गहराई में दबी होती है।
यह कविता "मेरी कलम", सिर्फ़ कविता ही नहीं है—ये हर उस शख़्स की आवाज़ है, जो शब्दों में अपनी दुनिया बसाए हुए हैं। आइए, इस कविता के ज़रिए उसे महसूस करें , एक कलम की आत्मा।
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