"चलें , हम तो परदेस चले ।" संयोग कुमार ठाकुर की सबसे सुंदर हिंदी कविता
चलें हम तो परदेस चले,
ओ गलियां गांव की, और घर भी छोड़ चले।
छोड़ा तुमको, दिल खुद ही तोड़ चले,
रह गए पीछे रिश्ते, हम आगे दौड़ चले।
चलें , हम तो परदेस चले ।
नंगे पाँव जो गलियों में फिरते थे कभी,
आज जूतों में भी वो सुकून कहां?
घर की रोटी, वो पीपल की छाँव छोड़ चलें,
हम तो हैं परदेसी,
चलें , हम तो परदेस चले ।
वो मिट्टी की खुशबू , खेतों की हरियाली,
हर शाम को चौराहे पर, वो चाय की प्याली।
नन्ही सी गुड़िया की हँसी, बहन की राखी,
सारे जज़्बात अब आँखों में ही बाँकी।
पिता की डाँट में जो प्यार छुपा था,
तब समझ में आया जब उनसे दूर हुआ था।
माँ की चुप्पी में जो चिंता बोलती थी,
हर सुबह अब वही ख़ामोशी रुलाती है।
यहाँ तो भीड़ है, मगर अपनापन नहीं,
हर चेहरा नया, कोई अपना मन नहीं।
कभी दौलत के पीछे भागे, कभी नींद गंवाई,
पर नींद में भी बस तेरी याद ही आई।
वो स्कूल की घंटी, वो मंदिर की आरती,
वो पीपल की छांव, वो आम की डाली,
वो बचपन के दोस्त, वो चाल ढाल मतवाली।
अब WhatsApp पे भी अधूरी लगती बातें,
दिल को चीर चले ।
चलें , हम तो परदेस चले ।
हम चले थे सपनों के पीछे, उम्मीदों की आस में,
मगर दिल रह गया पीछे, अपने पुराने के पास में।
परदेस की इन ऊँची इमारतों में,
गांव की झोपड़ी प्यारी लगती है ।
खुले छत पर वो हल्की ठंडी हवा जब चले,
चलें , हम तो परदेस चले ।
कब लौटेंगे, उस मिट्टी की गोद में,
जहाँ जीवन था सरल, और आत्मा थी शांति मद में।
कह दो दुनिया से, हमें अब नहीं दौड़ना,
हमें तो अपने गांव की मिट्टी में फिर से है जुड़ना।
चलें हम तो परदेस चले,
पर दिल वहीं गांव की गलियों में छोड़ चले।
न जाने फिर कब आऊंगा,
चल पड़ा शहर की ओर,
घर की घुंघट छोड़, आंखों में आंसू छलक पड़े।
हम तो हैं परदेसी,
चलें , हम तो परदेस चले ।
संयोग कुमार ठाकुर
जब आप घर परिवार से दूर हो रहें होतें हैं तो आपको कैसा अनुभव होता है। कृपया अपने अनुभव को कमेंट बॉक्स में शेयर करें। ताकि हमें भी एक नई राह मिल सके। आप सभी दिल से आभार।
धन्यवाद .......
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