Two colours of blood. "लहू के दो रंग।" Hindi poem

               लहू के दो रंग 

एक ही माँ की कोख से जन्मे, फिर भी दो राहों में बंट गए,
खून तो था एक ही रंग का, मगर रिश्ते कड़वाहट में बदल गए।
बचपन में जो संग खेले थे, वो अब जुदा खड़े हैं,
नफरत के अंधेरे में रिश्तों के दीपक बुझ पड़े हैं।

एक भाई दौलत के पीछे भागा, दूसरा सच्चाई पर अड़ा,
एक ने ज़मीर को बेच दिया, दूसरा जख़्मों से बड़ा।
एक के हाथ में सत्ता थी, दूसरे की जेब खाली,
एक महलों में हंस रहा था, दूसरा ग़रीबी में माली।

वो खेत जो दोनों ने सींचा था, अब बंटवारों में कट गया,
जो घर कभी अपनों का था, अब दीवारों में बंट गया।
बाप की आँखों का साया भी, अब दूर-दूर सा लगता है,
जो भाई था कल तक अपना, वो दुश्मन क्यों सा लगता है?

सियासत ने ज़हर घोल दिया, रोटी में भी नफरत है,
रक्त के रिश्ते बेमानी हैं, अब दौलत की हुकूमत है।
कोई धर्म के नाम लड़ा, कोई ज़मीन के टुकड़े पर,
कोई चुपचाप सहता रहा, कोई बसा नफरत के मुक़द्दर पर।

कब तक खून बहाएंगे हम, अपने ही अपनों का?
कब तक चाकू चलाएंगे हम, भाई के ही सपनों का?
कब समझेंगे कि यह खेल, साजिश का हथकंडा है?
जो हमें लड़ाकर खुद बैठे, उनके लिए तो ये धंधा है!

लहू एक ही रंग का है, फिर भी क्यों बैर बढ़ाते हैं?
भाई को भाई से अलग कर, कौन से सुख को पाते हैं?
जो दिल के नज़दीक था कभी, उसे क्यों दूर किया?
जो साथ लड़ा था बचपन में, उसे क्यों मजबूर किया?

अब भी वक्त है संभल जा, नफरत के बीज मत बो,
मिट्टी वही, खून वही, इसे अपनों से मत धो।
भाई को भाई बना रहने दे, मत बना इसे दुश्मन,
लहू का रंग एक ही होता है, न कर इसे विभाजन!

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