ग़ज़ल:" तुम करोगे याद उस चाहत के ज़माने को।" हिंदी गज़ल

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ग़ज़ल: तुम करोगे याद उस चाहत के ज़माने को ।

करोगे याद उस चाहत के ज़माने को,
जब चले जाएंगे हम, ना वापस लौट के आने को।
तुम करोगे याद उस चाहत के ज़माने को।

वो रंगीन शामें, वो बातों का सिलसिला क्या खूब था,
हर लम्हा समर्पित था बस तुझे मनाने को।
तुम करोगे याद उस चाहत के ज़माने को ।

तू रूठे तो दिल तड़प उठे बेक़रारी से,
क्या-क्या न किया तुझे फिर से हँसाने को।
तुम करोगे याद उस चाहत के ज़माने को।

तेरी मुस्कुराहटों में बसी थी मेरी ज़िंदगी की रौशनी,
अब अंधेरे मिलेंगे बस तुझे , मुझे भुलाने को।
तुम करोगे याद उस चाहत के ज़माने को।

कल जब तन्हा बैठोगे किसी मोड़ पर यूँ ही,
हम याद आएंगे तेरे अश्कों को बहाने को।
तुम करोगे याद उस चाहत के ज़माने को ।

हर एक बात में ढूंढते थे हम इश्क़ की परछाइयाँ,
क्या-क्या ना किया हमने तुझसे दिल लगाने को।
तेरे ख़तों की खुशबू अब भी महकती है,
दिल मजबूर हो जाता है फिर से पढ़ जाने को।
तुम करोगे याद उस चाहत के ज़माने को ।

तेरे शहर की गलियाँ अब भी पुकारती हैं,
हमारे साथ गुज़रे हर एक अफ़साने को।
कभी जो बरसती थी बारिशें, तुझ संग साथ चलकर,
अब भीगते हैं हम तन्हा, उस पुराने बहाने को।

वो चुपके से देखना, वो बेवजह रूठ जाना,
क्या दिन थे वो, तरसते हैं अब ज़माने को।
हमने तो हर जख्म को तेरी यादों से सी लिया,
पर किसे दिखाएं अब ये दिल के पुराने निशाने को।
तुम करोगे याद उस चाहत के ज़माने को।

कल जब वक़्त ठहर जाएगा तेरी तन्हाई में,
हम आकर याद आएंगे तुझे दर्द सुनाने को।
तेरा नाम अब भी दिल की धड़कन में बसता है,
मगर अब नहीं लौटते हम तुझे बताने को।
तुम करोगे याद उस चाहत के ज़माने को ।
                                संयोग कुमार ठाकुर 

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