"वो शाम जो इत्र सी महकी: एक मोहब्बत की ग़ज़ल"
ख़्वाबों की राहों में चुपचाप जाने कहां से आ गई हो,
इत्र की ख़ुशबू सी महके फिज़ा में,वो शाम बन गई हो ।
जैसे कोई साया हरदम साथ चलता है,
वो मेरी तन्हाई में भी तुम इक नाम बन गई।
इत्र की ख़ुशबू सी महके फिज़ा में,वो शाम बन गई हो ।
उसकी निगाहों में था जो मौसम बहार का,
हर एक नज़्म मेरी उसी के नाम बन गई।
इत्र की ख़ुशबू सी महके फिज़ा में,वो शाम बन गई हो ।
जब भी हवा आई, उसकी खबर वो लेकर आई ,
हर एक बात उसकी , मुझको बताई ।
धड़के दिल जोरों से,जब नाम उसका जुबा पे आए,
इत्र की ख़ुशबू सी महके फिज़ा में,वो शाम बन गई हो ।
रू-ब-रू वो नहीं, फिर भी मौजूद है वो कहीं,
दिल की हर धड़कन उसी का पैग़ाम बन गई है।
इत्र की ख़ुशबू सी महके फिज़ा में,वो शाम बन गई हो ।
छू नहीं पाया उसे, फिर भी उसे महसूस करता हूं,
तूम याद आती हो सुबह सबेरे,
जैसे कोई चीज़ गुम गई है,
इत्र की ख़ुशबू सी महके फिज़ा में,वो शाम बन गई हो ।
संयोग कुमार ठाकुर
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