"मैं कविता हूँ" — एक कविता जो आपके भीतर की खामोशी को शब्दों में ढाल देती है।
मैं कोई नाम नहीं,
न कोई पहचान हूं।
मैं वो गीत हूँ,
जो बिना आवाज़ के ही गूंजती है।
मैं वो कविता हूँ ,
जो लिखी नहीं जाती,
महसूस करो मुझे,
मैं वो हूं जो सबके समझ नही आती।
जब कोई बच्चा पहली बार
बोलने से पहले मुस्कराता है,
मैं वहाँ भी होती हूँ।
जब एक पिता जब -
अपने सपनों को जला देता है ,
मैं वहाँ भी होती हूँ।
मैं हर उस औरत की आँख में
बसी एक सपना हूँ,
जो खुद को भुलाकर-
घर को अपनी मुस्कराहटो से सजाती है।
मैं सूरज की पहली किरण में,
छुपी उम्मीद की तरह हूँ।
और चाँदनी की चुप्पी में,
छुपी हुईएक राज़ हूं।
मैं हर टूटे हुए इंसान का साहस हूँ,
जो हार के बाद भी,
जितने का उम्मीद लेकर संघर्ष करता है।
कभी कभी,
जब तुम थककर बैठते हो,
और तुम्हें कोई समझने वाला नहीं होता ,
तब मैं तुम्हारे भीतर जागती हूँ।
मैं कहती हूँ,
"तू अकेला नहीं है।
तेरा वो खूबसूरत बीता हुआ कल भी तेरे साथ है।"
मैं बारिश की बूँदों में,
आसमान को छू लेने की चाह हूँ।
मैं वो ऊची पहाड़ों की में
वो गूंज हूँ,
जो केवल सच्चा प्रेम ही सुन सकता है।
जब तुम अपने सपनों को छोड़ कर
सिर्फ दुनिया की बात मानते हो —
मैं तुम्हें भीतर से कचोटती हूँ।
मैं तुम्हारे अंदर का वो हिस्सा हूँ
जो तुम्हे कभी झुकने देना नहीं चाहता ।
मैं हवा की तरह हूँ —
नज़र नहीं आता,
बिना मेरे सब कुछ सुना - सुना सा लगता है।
जब तुम किसी को
बेवजह माफ़ कर देते हो —
जब तुम खुद से लड़ते हुए
कभी खुद को ही गले लगा लेते हो —
मैं वही हूँ।
मैं हर इंसान के भीतर छुपा ईश्वर हूँ,
और चेतन के भीतर छुपा अचेतन भी।
मैं जड़ भी हूं और फूल भी हूँ।
मैं सवाल भी हूं , और
जवाब भी हूँ।
मैं हर भाषा से परे
एक मौन संगीत हूँ।
मैं हर मज़हब से ऊपर,
एक सच्ची प्रार्थना की गीत भी हूँ।
मैं कविता हूँ,
जिसे तुम पढ़ते नहीं —
उसमे जीते हो।
तो जब अगली बार
ज़िंदगी की भीड़ में खुद को भूल जाओ —
तो एक पल ठहर कर
अपनी धड़कनों से पूछना,
"क्या मैं अब भी कविता हूँ?"
किसी के लिए गीत,
किसी का मीत हूं।
मैं हर भाषा में सजती हूं ।
किसी के दिल की बात ,
किसी के दिल तक पहुंचाता हूं
हां मै कविता हूँ।
हां मै कविता हूँ.......
संयोग कुमार ठाकुर
💝💝💝> कभी आपने खुद से पूछा है, "क्या मैं अब भी ज़िंदा महसूस करता हूँ?"
अगर नहीं, तो ये कविता आपके भीतर सोई उस आवाज़ को जगा देगी,
जो कहती है — "मैं हर किसी में हूँ, मैं कविता हूँ..."
यह कविता सिर्फ शब्दों का मेल नहीं, बल्कि आत्मा का संगीत है।
हर उस इंसान के लिए जो जीवन की भीड़ में खुद को भूल चुका है।
पढ़िए, महसूस कीजिए और जानिए — आप भी कविता हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें