"चीत्कार" हिंदी कविता

      
        😰  चीत्कार   😰

जंगल सिसकता है रात के अंधेरे में,
चाँदनी भी डरती है रात के सन्नाटो से।
पेड़ों की शाखों में कुछ टूट चुका है,
पत्तों की सरसराहट अब विलाप बन गई है।

धरती का सीना चीर कर
जब मशीनें झूमती हैं गर्व से,
एक माँ चीखती है भीतर ही भीतर—
पर कोई नहीं सुनता,
क्योंकि उसकी चीख,
हमारे विकास के नारों में दब जाती है।

चीत्कार है वो बच्ची की,
जो स्कूल जाना चाहती थी ।
पर किताबों की जगह
उसके हाथों में बेलन थमा दिया गया।
उसकी आँखों में ख्वाब नहीं,
बस धूल भरी सुबहें हैं,
और सांझ की थकी साँसे।

चीत्कार है उस बाप की,
जिसने अपने बेटे को आख़िरी बार
अस्पताल के दरवाज़े पर देखा ,
पैसों की कमी ने साँसे छीन लीं।
उसकी चुप्पी अब दीवारों पर
फटी हुई तस्वीर बनकर टंगी है।

चीत्कार है एक किसान की,
जो आसमान की ओर देखता है,
बारिश की उम्मीद में ।
पर बदलो ने बिजली गिरा दी ,
उसकी आंख में,
सिर्फ़ कर्ज़ और पर्चियाँ बचीं उसके हाथ में।

चीत्कार है उस औरत की,
जिसका आत्म-सम्मान
हर रात दरिंदों की हवस में
कुचला जाता है।
वो सुबह उठती है,
चेहरा धोती है,
और फिर उसी समाज में जीती है
फिर उसके ज़ख्मों को “इज़्ज़त” 
नाम का हवाला देकर ढँक दिया जाता है।

चीत्कार है उस नौजवान की,
जिसने सपनों की गठरी बाँधी थी,
लेकिन बेरोजगारी के तूफ़ान ने
उसका हर सपना छीन लिया।
वो मुस्कुराता है इस भीड़ में,
पर तकिये की भीगती परतें
उसका सच बताती हैं।
चीत्कार है उस पेड़ की ,
जिसे काट दिया गया
क्योंकि वहाँ मॉल बनना है।
उसकी शाखें जो कभी
झूलों का बोझ उठाती थीं,
अब सूखी लकड़ी बनकर
किसी रसोई में जल रही हैं।

चीत्कार है इस सदी की,
जहाँ तकनीक तो है,
पर संवेदना नहीं।
जहाँ विकास की परिभाषा
प्रकृति और मानवता को कुचल कर लिखी जाती है।

ये चीत्कार चुप है,
लेकिन इसका शोर गूंजता है भीतर—
हर संवेदनशील आत्मा में।
ये प्रश्न करता है हमसे:
क्या हम सच में आगे बढ़ रहे हैं?
या बस भाग रहे हैं…
खुद से, एक-दूसरे से, इस प्रकृति से?

कभी सुनो ये चीत्कार,
इस शोर में जो चुप है,
वही है असली चीत्कार।
क्योंकि जो रोता है खुल कर,
वो हल्का हो जाता है,
पर जो भीतर ही भीतर रोता है,
वो रोज़ जीता और मरता है।

चीत्कार सिर्फ़ शब्द नहीं,
ये इतिहास की करवट है,
वर्तमान की चेतावनी,
और भविष्य का फैसला है।
यदि अभी न सुना गया इसे,
तो आने वाली नस्लें
शब्दों में नहीं,
हवाओं में अपनी चीखें सुनेगी।

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