"आख़िर कब तक इंतज़ार करूँ तेरा ।" हिंदी कविता
💫आख़िर कब तक इंतज़ार करूँ तेरा ।
मेरी हर शाम ढलती है तेरी यादों में,
चाँदनी पूछती है मुझसे हर रातों में,
क्यों अब भी जलता है दिल बेवजह।
आख़िर कब तक इंतज़ार करूँ तेरा,
मेरी हर रात कटती है तेरी यादों में।
हर मोड़ पर देखी हैं परछाइयाँ तेरी,
हर मुसाफिर में ढूँढी तस्वीर ,वही पुरानी।
तेरे बिना अधूरी हैं मेरी हर लम्हा,
और थमी-थमी सी लगती है रवानी।
आँखें अब भी ख्वाब बुनती हैं तेरे,
पर जागते हैं पल पल तेरे इंतज़ार में ।
तेरी आवाज़ अब भी गूंजती है,
जैसे मौसम भी तेरे नाम से शुरू होती है।
कितनी बार सोचा, छोड़ दूँ ये आस,
पर दिल ने कहा — शायद हो जाए कोई बात।
हर दस्तक पर उठ जाती है नज़रें ,
क्या पता वो साया जो लौट आया हो कहीं।
तेरे बिना हर चीज़ अधूरी लगती है,
जैसे बिना धड़कन के कोई धुन बेसुर बजती है।
तेरे बिना चाय भी फीकी हो जाती है,
और बारिश भी सूनी सूनी लगती है।
तू नहीं आया तो क्या,
तेरी यादों ने तो गले लगाया है।
तेरे वादों ने मुझे अब तक
इस टूटे सफर में थामे रखा है।
पर अब ये दिल थक चुका है ,
तेरे लौटने की दुआ में भी कमज़ोर हो गई है।
क्या तुझे भी मेरी तड़प सुनाई नहीं देती?
या तेरा दिल अब किसी और के लिए धड़क रहा है?
आख़िर कब तक यूँ ही पल-पल काटूँ मै,
तेरे नाम की माला कब तक बाँधूँ मै ?
तू ही बता
क्या वाकई लौटेगा कभी वो दिन,
या बस यूँ ही मेरे ख्वाबों में ही छुपा रहेगा सदा-सदा?
अब तो बस एक ही सवाल है दिल से —
आख़िर कब तक इंतज़ार करूँ तेरा...?
आख़िर कब तक इंतज़ार करूँ तेरा,
हर शाम बिछाकर उम्मीदों की चादर,
आसमान की ओर ताकता हूँ मैं —
शायद कोई तारा बनकर तू उतर आए।
संयोग कुमार ठाकुर
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें