"दादी-नानी की कहानियाँ: एक भावुक कविता जो बचपन की गोद में लौटा ले जाती है"
कविता: दादी,नानी की कहानी ।
जब नन्हीं-सी दुनिया थी, तब सपनों का घर था,
आंगन में खिली धूप, दादी के जादू का असर था।
झुर्रियों में छुपी थी किताबों की बात,
हर रात एक नई किस्सा, हर दिन एक नई सौगात।
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चाँदनी रातों में, जब तारें जब टिमटिमाती थी,
दादी की गोदी, तब स्वर्ग बन जाती थी।
बिन किताबों के, बिन किसी कहानी के पन्ने,
दादी की ज़ुबां से निकलते थे किस्सों के गहने।
राजा और रानी की ,परियों की
टोली,
भूतों की डरावनी कहानी, पर मज़ेदार वो बोली।
दादी-नानी जब वो किस्से सुनाती,
शब्दों से जैसे कोई जादू छलकाती।
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बरामदे में बैठकर, तेल मलती थी वो,
सिर सहलाते हुए, गीत भी गाती थी वो।
"चंदा मामा दूर के", फिर " वो लोरी की बात",
उनके स्वर में थी जैसे माँ की छाँव साथ।
खिलौनों से नहीं, उनके बोलों से खेला,
उनकी कहानी से ही तो जीवन का मेला।
घंटों गुज़र जाते, वक्त का पता न चलता,
दादी,नानी की प्रेम की छांव में,
बड़ा सुकून था मिलता।
बरसात की शामें, गरम आलू के चाट,
दादी के हाथों का था, अलग ही स्वाद।
कभी रुठते, कभी हँसते, पर जब वो बुलाती, प्यार से
"आजा मेरे राजा बेटा", सारी नाराजगी गायब हो जाती।
अब भी , जब दिल उदास हो जाए,
तो दादी,नानी की वो बातें यादों में समाए।
न फ़ोन था, न टीवी, न कोई बहाना,
बस दादी और मैं – एक प्यारा फसाना।
दादी,नानी अब शायद तारे में रहती है,
किस्सों की दुनिया अब सन्नाटे में बहती है।
पर उसकी कहानियाँ, उसकी वो बातें,
अब भी दिल के अंदर आवाज़ें उठाती है।
काश! फिर से जा सकूं उस आँगन में कभी,
जहाँ दादी ,नानी की गोदी हो, और हो वो कहानी सभी।
कहानी ही नहीं थी , वो एक दुनिया थी प्यारी,
दादी,नानी की कहानी थी — जीवन की फुलवारी।
संयोग कुमार ठाकुर
1. यादें : दादी-नानी की गोदी, कहानियाँ, बरसात की शामें, गरम चाट — ये सब चीज़ें उस दौर की याद दिलाती हैं जब प्यार और अपनापन तकनीक से नहीं, स्पर्श और आवाज़ से जुड़ा था।
2. सांस्कृतिक संदर्भ: "चंदा मामा दूर के", "तेल मालिश", "राजा बेटा" — ये विशुद्ध भारतीय अनुभव हैं, जिनमें आत्मीयता और निजी स्पर्श झलकता है।
3. प्राकृतिक प्रवाह: कविता का बहाव सहज और भावुक है, जैसे कोई अपनी ही यादों में खोकर बात कर रहा हो ।
आप अपनी यादों को जाहिर करें।
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