"चेहरे झलकते थे चिट्ठी में, और मुलाकातें ख्वाब में होती थीं..." संयोग कुमार ठाकुर की हिंदी प्रस्तुति।


💃💦चेहरे झलकते थे चिट्ठी में। 

वो वक्त कहा खो गया,

जब लोग अपनी चुप्पियों को चिट्ठियों में लिखते थे।

हर पंक्ति में छुपा होता था एक जज़्बा,

हर लफ्ज़ से टपकती थी कोई दबी हुई प्रेम की भावना।


वो काग़ज़ का टुकड़ा नहीं था ,

बल्कि दिल का आइना था।

स्याही से नहीं, वो रूह से लिखा जाता था,

और फिर मोड़ा जाता था उसे

दोनों हाथों से, बड़े एहतियात से।

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वो चिट्ठियाँ —

जिनमें “कैसे हो?” सिर्फ़ औपचारिक सवाल नहीं होता था,

बल्कि हज़ारों मील की चिंता का वजन लिए आता था।

“याद आ रहे हो” कहना,

मतलब हफ़्तों की बेचैनी को एक वाक्य में समेट देना।

ऐसा था वो जमाना।

वो ज़माना था जब डाकिए का इंतज़ार

इश्क़ से कम नहीं होता था।


उसकी साइकिल की घंटी सुनते ही

धड़कनें तेज़ हो जाया करती थीं।

लिफ़ाफ़ा हाथ में लेते ही

सबसे पहले उसकी खुशबू सूंघी जाती थी,

क्योंकि वो खुशबू...

कभी भेजने वाले के घर की मिट्टी की होती थी,

जो कभी उसके हाथों की छुअन की।


कभी माँ बेटे को चिट्ठी में प्यार भेजती थी,

तो कभी एक प्रेमिका

हर शब्द में अपना पूरा दिल रख देती थी।

एक साधारण-सा ‘लिखो ज़रूर’

मानो बिन कहे कहता था — "मैं इंतज़ार करूँगा।"


क्या वो जमाना था ।

चिट्ठियाँ सिर्फ़ संवाद नहीं थीं,

वो तो सब्र की तालीम थीं।

हर जवाब महीनों बाद आता था,

मगर जब आता था,

तो सीधे दिल में उतरता था।

अब न वो चिट्ठियाँ हैं,

न वो सब्र।

अब हर बात सेकंडों में होती है,

मगर एहसास कहीं खो गया है।


आज इमोजी में वो बात नहीं,

जो कांपते हाथों से लिखी एक सच्ची बात में होती थी।

चेहरे झलकते थे चिट्ठी में,

और मुलाकातें ख्वाब में होती थी।


काश फिर से लौट आता वो दौर,

जब अपने जज़्बात

कागज़ पर उतारे जाते ,

जब प्यार का मतलब

बस "I Love You" लिखना नहीं होता,

बल्कि उसे सहेजना,

डाक से भेजना

और बेसब्री से उसका जवाब पाना होता।

काश! वो ज़माना ना गया होता।

संयोग कुमार ठाकुर 

क्या आपने कभी किसी की चिट्ठी का इंतज़ार किया है?
अगर हाँ, तो ये पोस्ट आपके लिए है।
दिल से शेयर करना... हो सकता है कोई और भी इन पलों को जी चुका हो।

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