कविता: तुम्हें टूटते देख नहीं सकता ।
कविता: तुम्हें टूटते देख नहीं सकता ।
तुम्हें टूटते देख नहीं सकता,
कि जैसे शाख से गिरता कोई हरा पत्ता,
जैसे चाँद पर छा जाए कोई धुंधली ,
या किसी मासूम की आँखों में आ जाए आंसू।
तुम्हारी मुस्कान में ही तो
सजी हैं मेरा सवेरा,
तुम्हारी हँसी की गूंज ही
बनती है मेरी तन्हा रातों की नींद।
अगर वो थम जाए,
तो जैसे रुक जाए मेरी सांसें भी—
धीरे-धीरे, चुपचाप, बेबस , और बेजान।
तुम्हें टूटा हुआ देख
ऐसा लगता है जैसे हो कोई मंदिर
http://superindiastory.blogspot.com/2022/09/come-now-lets-go-back-home.html
बिना पूजा के सूना हो गया हो,
या जैसे कोई कविता,
अपने ही शब्द भूल गई हो।
तुम्हारी खामोशी की चीख
मेरे दिल को बेचैन कर देती है।
मैं जानता हूं,
तूफ़ानों से लड़ना तुम्हारी आदत है।
पर वो आँधियाँ
तुम्हारे भीतर कहीं घर न बना लें,
तो कैसे न घबराऊँ?
कैसे न काँप उठूँ मैं,
जब मेरी सबसे मजबूत दीवार
मेरे सामने दरकने लगे ?
तुम अगर बिखर जाओगे,
तो मेरी दुनिया का हर रंग
फीका पड़ जाएगा,
मेरे ख्वाब अधूरे रह जाएंगे
और मेरी उम्मीदों का दिया बुझ जाएगा ।
मैं चाहता हूँ,
जब तुम थको,
तुम्हें मेरी बाँहों में सुकून मिले,
जब भी आँसू बहें,
तो मेरा कंधा उन्हें समेट ले।
तुम्हारे टूटने से पहले
मैं हज़ार बार बिखर जाऊँ,
पर तुम्हें यूँ ग़मो की दरिया में
डूबते नहीं देख सकता।
कभी रुक जाओ मेरे पास,
कुछ पल मेरे लिए ,
मैं हर दर्द को ओढ़ लूंगा,
अगर तुम मुस्कुराना फिर से सीख जाओ।
संयोग कुमार ठाकुर
http://superindiastory.blogspot.com/2024/11/love-is-infinite-hindi-english-poem.html
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें