"मुझे तुम कब दोगी।"Hindi Kavita

मुझे तुम कब दोगी 

मुझे तुम कब दोगी
वो मुस्कान जो रौशनी सी लगे,
जिसमें दिन भी संवर जाए,
और रातें भी सुकून से भर जाएं।
मुझे तुम कब दोगी
वो नज़रें जो कुछ कहती हों,
बिना बोले भी मेरे
हर जज़्बात को समझ लेती हों।

मुझे तुम कब दोगी
एक पल जिसमें तुम मेरी हो,
बिना डर, बिना पर्दों के,
बस सच में मेरी हो।

मुझे तुम कब दोगी
वो वक़्त जो थम सा जाए,
जिसमें हम दोनों बस
एक-दूजे में खो जाएं।

मुझे तुम कब दोगी
अपने ख्वाबों की चाबी,
ताकि मैं भी चल सकूं
तेरे साथ उस राह पर जहां बस हम हैं।


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