कुछ देर ठहर जाते तो क्या होता?


कुछ देर ठहर जाते तो क्या होता?

कुछ देर ठहर जाते तो क्या होता?
काश! दिल की आरज़ू सुन पाते तो क्या होता?

चाँदनी रातें रोशनी बन जाती,
ख़्वाबों में तुम आ जाते तो क्या होता?

बरसों की चाहत बहारें बन जाती,
बाहों में तुम समा जाते तो क्या होता?

तन्हाइयाँ भी ग़ज़लें सुनाती है,
लबों से तुम गुनगुनाते तो क्या होता?

आँखों में सजोए हैं अनगिनत ही सपने,
सच उनको कर दिखाते तो क्या होता?

बिछड़ के भी तुम दिल में रह जाते,
यूँ बेवजह दूर जाते तो क्या होता?

बारिस की बूंदें सवाल कर रहीं हैं,
साथ इनको निभाते तो क्या होता?
कुछ देर ठहर जाते तो क्या होता?
काश! दिल की आरज़ू सुन पाते तो क्या होता?

       संयोग कुमार ठाकुर 

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