"इक रात की कहानी: चाँदनी, खामोशी और अधूरे लम्हे"
💥 इक रात की कहानी है।
चाँद भी कुछ अनकहा सा था,
सितारे नींद में डूबे थे,
हवा भी धीमे सुर में कुछ
बीते लम्हे गुनगुना रही थी।
शायद! कहानी उस रात की सुना रही थी।
इक रात की ये कहानी है,
कुछ अधूरी, कुछ पुरानी है।
दिल की दीवार पे टंगी तस्वीर-सी,
थोड़ी धुंधली, थोड़ी सुहानी है।
ये कहानी कुछ पुरानी है।
सड़कें खामोश थीं उस रोज़,
बस मेरे क़दमों की आवाज़ थी,
एक पुरानी चिट्ठी सी हवा
हर मोड़ पे साथ चलती थी।
चांद और उसमें बस एक ही अंतर था।
वो आसमान में तो
ये ज़मी पर चलती थी।
छत पे बैठा मैं और वो ख्वाब,
दोनों कुछ कहने को तैयार थे,
मगर लफ़्ज़ जैसे डर गए हों,
या जज़्बात थक से गए हों।
उसने कहा कुछ भी नहीं,
बस आँखों में सावन उतरा,
मैंने भी चुप्पी ओढ़ ली,
जैसे मन का दीप बुझा।
बीत गई वो रात मगर
हर रात में वो लौट आती है,
वो चुप्पियाँ, वो साँसें,
अब भी मेरी नींद चुराती हैं।
यादें उसकी बहुत सताती है।
इक रात की कहानी है,
जिसमें चाँद भी गवाह बना,
जिसमें दिल ने इश्क़ किया,
और दिमाग़ ने फासला रखा।
कुछ अधूरे वादे थे,
कुछ न कहे अल्फ़ाज़ थे,
एक सन्नाटा जो चीखता रहा,
दो दिलों के दरमियान ,
हां! ये कहानी उस रात की है।
अब सुबह आती हैं रोज़ नई,
पर उस रात की रंगत कुछ और थी।
वो एक एहसास, एक पल,
जो अब तक मेरे संग और है।
इक रात की ये कहानी है,
न जाने कितनों की ज़ुबानी है,
कोई हँस के सुनाता है,
तो कोई रोकर ,
ये कैसी कहानी है।
ये दरिया है यादों का,
या मौजों की रवानी है ।
संयोग कुमार ठाकुर
💬पढ़िए और महसूस कीजिए उस रात की ख़ामोशी को…
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