मै इंसान हुँ, इंसान को ढूँढ़ने आया हूं।
घर से निकला हूँ कुछ अरमान लेकर,
सुनसान राहों में उम्मीदों का चाँद देखकर ।
अंजान हैं रास्ते, अंजानी बस्ती है,
हर सख्स अब अंजाने से हैं,
शायद भूल गये हैं उन बीते लम्हों को
बस यही याद दिलाने आया हूँ ।
मै इंसान हूँ, इंसान को ढूंढ़ने आया हुँ ।
वो बचपन क्या बीत गया ।
लगता है
अपनो से रिस्ता नाता टूट गया ।
सभी लोग मेरे थे,
लोगों को आपस में बहुत प्यार था।
मेरा गाँव ही मेरा घर परिवार था ।
ना हो किसी से किसी को डर,
मन मे एक विश्वास जगाने आया हूं।
मै इंसान हुँ, इंसान को ढूँढ़ने आया हूं।
कोई बाबा, कोई चाचा ,
कोई था बड़का भईया,
वो बचपन की यारी
भईया के घोड़े की सवारी ,
मेरे पड़ोस के दादी की,
उड़ती परियों की कहानी ।
दुकान वाले बाबा का
गाली भी गाना लगता था ।
ना जाने किस स्वर्ग के झमेले में
पड़े हैं लोग सारे ।
मै तो धरती का स्वर्ग दिखाने आया हूँ ।
मै इंसान हूँ, इंसान को ढूंढ़ने आया हुँ ।
कहाँ गये वो लोग सारे,
उन्हें ढूँढ़ते - ढुंढ़ते थक गए नैन हमारे ।
आओ ना बाबा, वो गीत सुनाओ ना ,
डरा के भी हमको,
वो सच्चा प्यार जताओ ना ।
ओ पड़ित जी, ओ मुल्ला जी,
ओ बनिया चाचा ,ओ मदारी वाले बाबा,
कोई जादु का खेल दिखाओ ना।
आप कहाँ छुप गए हो,
जल्दी बाहर आओ ना।
आज आप सभी के बीना मन उदास है।
बहुत डरा - डरा सा हुँ मै ,
मुझे ऐसे तुम डराओ ना ।
मेरा गाँव है सुना - सुना
बिसरे - बिखरे हैं लोग सारे ,
मै उन्हे इक्टठा करने आया हूं।
मै इंसान हुँ, इंसान को ढूँढ़ने आया हूं।
चढ़ा है नसा झुठी सान का ,
नफरत की आग में
जल रहें हैं लोग सारे,
कौन कहता है
धरती खुन की प्यासी है।
धरती तो माँ है,
जो सभी को अपनी गोद में समेटी है ।
फिर कौन बड़ा , कौन छोटा,
खुद ही जात - पात के भेद भाव में उलझे हैं ।
क्यों भाई - भाई का दुश्मन है।
मै तो भाई को मिलाने आया हूँ।
मै इंसान हुँ, इंसान को ढूँढ़ने आया हूं।
अगर बुरा लगे बात संयोग का
तो पढ़ लेना इतिहास ।
सब कुछ यहीं धरा काधरा रह जाएगा ।
विश्व विजेता सिकंदर भी गया था खाली हाथ ।
फिर क्यो करते हो लोभ मन में,
किसी को क्यों सताते हो ।
तुम कब बनोगे राम ,
खाली राम नाम गाते हो ।
मै त्रेता के राम की बात नही करता,
मै कलयुग में ही राम ढुँढ़ने आया हूँ
मै इंसान हुँ, इंसान को ढूँढ़ने आया हूं।
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