इधर पटाखे, उधर पटाखे ।
इधर पटाखे, उधर पटाखे।
इधर पटाखे, उधर पटाखे,घर भी पटाखे, बाहर भी पटाखे ।लक्ष्मी को घर हम कहाँ बुलाते,उल्टा लक्ष्मी को हम घर से हैं भगाते ।कानून कहती पटाखे बेचना ,पटाखे उड़ाना ,प्रदुषण फैलाना, कानूनन अपराध है।पर जो उड़ाए पटाखे ,उनकी ही तो साख है।
बच्चा हो या बुढढ़ा,नर हो या नारी,पटाखे उड़ाए दुनियाँ सारी ।थोड़े लोगे तो फूट,ज्यादा पर छुट हैं।गाँव भी धुंआ - धुंआ,शहर भी धुंआ धुआ,पटाखे उड़ाकर प्रदुषण फैलाने की छुट है ।अगर ना फूटे पटाखे तोफिर त्योहार कैसा,आज कल पटाखे उड़ाने की रित है ।जब तक ना गूंजे पटाखों की आवाज,फिर कैसी शादी,कैसा त्योहार,जब तक ना उड़े पटाखे,फिर दिवाली भी है बेकार ,पटाखो से ही दिवाली को प्रीत है।
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