"मैं रास्ते का पत्थर " I am the road stone 🪨
मैं रास्ते में पड़ा रहा ।
लोग आते गये,
पैरो से अपने ठोकर लगाते गये ।
कभी आग में जलाया गया ।
इससे भी जी ना भरा तो
पानी में डुबाया गया ।
मैं रास्ते का पत्थर
फिर रास्ते में ही पाया गया ।
फिर वही ठोकरें फिर वही दाग
किचड़ जुते का
जिस्म पे मेरे लगाया गया ।
मैं रास्ते का पत्थर
रास्ते में ही पाया गया ।
ठोकरें खाना शायद
आदत सी हो गयी है।
लड़ाई झगड़ा किसी और का
फिर भी उन लफड़ों में
मुझे ही फसाया गया ।
मैं रास्ते का पत्थर
रास्ते में ही पाया गया ।
ना कोई मेरा दोस्त
ना कोई मेरा दुश्मन,
करू बड़ाई किसी से
मेरी इतनी औकात नहीं ,
मैं रास्ते का पत्थर,
लोगों के पैरो की ठोकरें खाना
यही मेरी औकात रही ।
एक कक्त ऐसा आया,
एक भिखारी ने मुझे हाथों से उठाया ।
मै बहुत सहम सा गया ।
मैं बहुत घबड़ाया ।
मै रास्ते का पत्थर,
जब उसने मुझे हाथ लगाया ।
मै रास्ते का पत्थर,
एक हाथ से दूसरे हाथों में उछाला गया।
फिर मेरे ही समूह से
मुझको टकराया गया ।
फिर उठाया हाथ मुझे ,
चल पड़ा लिए साथ मुझे ।
जब मै आया उसके घर ।
लगने लगा मुझको डर ।
जब धार मुझ पर
छेनी का करने लगा ।
मैं रास्ते का पत्थर
रास्ते पे ही ठीक था ।
डर अब यहाँ लगने लगा ।
मैं आवाज भी किसको देता,
चुपचाप जुल्म उसका सहता रहा ।
छेनी और हथौड़े से दर्द,
वो थोड़ा-थोड़ा देता रहा ।
मेरी आहें निकल रहे थे
टन - टन , टन - टन करके '
मेरा दर्द कहाँ किसी को था सुनाई देता ।
मै रास्ते का पत्थर,
चुपचाप था दर्द से रोता ।
ये क्या गजब हो गया ।
मै क्या था क्या हो गया ।
मै बहुत घबड़ा गया ।
मैं कहाँ था कहाँ आ गया ।
शायद मंदिर होगा या गिरजा घर,
अब क्या जुल्म होगा मेरे साथ,
जब सीने से मुझको लगाया गया ।
मै रास्ते का पत्थर
अब लोगों के बीच पाया गया ।
बहुत भीड़ लगी थी ।
मुझे अब आसन पे बैठाया गया था ।
जो लोग मुझे कल मारते थे ठोकर ,
अब सर उसका
मेरे सामने नवाया गया ।
तब मुझे याद आया
उस भिखारी शिल्पकार का ।
ना जाने उसने मुझे बनाया किस आकार का ।
सब खेल समझ आने लगा
अब मुझे इस संसार का ।
मै कैसे चुकाऊंगा कर्ज
उस शिल्पकार का ।
लोग आते गये,
शिश अपना नवाते गये ।
जब सबने सुनाई अपने दिल कि फरियाद ।
फिर वो दिन मुझे बहुत याद आने लगा ।
मुझे बहुत हँसी आ रहा था ।
रोके ना रोका रहा था ।
मै हँसु भी तो किसपे,
अपनी या उनकी मुकद्दर पें ।
कल मैं था रास्ते का पत्थर,
अब मुरत मुझे बनाया गया ।
वो मुझसे फरियाद करने वालों,
ज़रा वो दिन याद करो,
तूने ही तो मारा था मुझे पैरो से ठोकर ,
क्या वो वक्त भुल गये ।
ज़रा अपने कर्मो को याद करो ।
मै शुक्रगुजार हूँ
उस शिल्पकार का,
जिसने मुझे है तरासा ,
अब मैं भी देखूंगा
तेरे तकदीर का तमासा ।
मै रास्ते का पत्थर,
तुम पत्थर से क्या करते हो अभिलाषा ।
जस करनी, तस भरनी ।
करो कर्म ऐसी,
ना करना पड़े किसी से आशा ।
Sanyog kumar Thakur
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