झरनों की झंकार कविता | प्रकृति पर सुंदर हिंदी कविता
🌅 झरनों की झंकार
जबशाम ढ़ले,
बिछाए निशा अपनी जाल ,
नभचर गए अपने नीड़,
खग करे चूँ - चूँ,
झरनें गिरे झड़ - झड़ ,
गूँज रही है झरनों की झंकार ।
कितना रम्य है यह संसार ।
इस अचल पर देखों ,
उस अचल पर देखों ,
जलती दामिनि की मयुख से '
ऐसा लगे ,जैसे
टिम - टिमाते तारे गगन में , जब भोर भए नभचर उड़े आकाश,
तब भी झरनो से गिरते अम्बु की धारा,
गूँज रही है झरनों की झंकार,
कितना रम्य है यह संसार ।
💭 भावार्थ (Explanation)
कवि इस कविता के माध्यम से प्रकृति के शांत, मधुर और मनोहारी रूप को प्रस्तुत करना चाहता है।
संध्या का दृश्य: जब दिन ढलता है, पक्षी अपने बसेरों में लौट जाते हैं और चारों ओर शांति छा जाती है।
प्रकृति की ध्वनि: इस शांति में झरनों की गिरती जलधारा “झर-झर” की ध्वनि से वातावरण को जीवंत बना देती है।
आकाश का सौंदर्य: बिजली की चमक और तारों की रोशनी प्रकृति को एक अद्भुत रूप देती है।
भोर का आगमन: सुबह होने पर भी यह प्राकृतिक संगीत जारी रहता है, जो जीवन की निरंतरता और सौंदर्य का प्रतीक है।
कुल मिलाकर, यह कविता हमें प्रकृति के प्रति प्रेम और उसकी अनंत सुंदरता को महसूस करने के लिए प्रेरित करती है।
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